जिनसे हम छूट गये अब वो जहां कैसे हैं
शाखे गुल कैसे हैं खुश्बू के मकां कैसे हैं |
ऐ सबा तू तो उधर से ही गुज़रती होगी
उस गली में मेरे पैरों के निशां कैसे हैं ?
कहीं शबनम के शगूफ़े कहीं अंगारों के फूल
आके देखो मेरी यादों के जहां कैसे हैं ?
मैं तो पत्थर था मुझे फेंक दिया ठीक किया
आज उस शहर में शीशे के मकां कैसे हैं ?
Sunday, July 6, 2008
Thursday, June 26, 2008
इलाहाबादी बकैत की शुरुआत.
अमलेंदु भाई और हम दोनों बचपन के मित्र हैं और इलाहाबाद की मिटटी से बहुत पुराना नाता है। आज हम दोनों खाली बैठ के बकैती कर रहे थे तभी इस ब्लॉग की बात सूझी और इसको लेकर आप के सामने हैं। आप लोगों का सहयोग अपेक्षित है.
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